रविवार, 7 दिसंबर 2025

दीयारा देश ला || सूरज सिंह राजपूत

दीयारा देश ला

वो रोज जलाती थी एक दीया,
ठीक सुबह 11 बजे।
मिट्टी का एक दीया,
जिसके पीछे,
लाल,
सफेद,
आँटे से लिखती थी
“बबुआ”।
बबुआ,
मेरा जिज्ञासु मन
पास ही मैं खड़े बुजुर्ग चाचा से
पूछ ही बैठा
चाचा,
ई दीया रोज ऐसे ही?
वो भी सुबह 11 बजे?
चाचा ने
लाल रंग के गमछे से
अपनी आँखें पोंछते हुए कहा
“ई दीया, बभुआ खातिर।
हम पूछनी
"बभुआ", ई कइसे?
त चाचाजी कहे
‘उनकर बबुआ
ई देश के दियारा
दीयारा जे जरल देश खातिर !
ठीक एहिए समय,
सबेरे 11 बजे…’
बड़ भिर भइल रहल,
पूरा जवार बाटोरल रहल।
जे दिन बभुआ के देह सरकार लेके आइल रहल।
पत्रकार लोग के तमाम रेला लगल रहल।
अब कहाँ केहू आवेला…
ए बाबू, अब हमरे से कुछ मत पूछऽ।
उ दिन आँखिये से सोझा नाचे लागल।
हम जाति से हजाम बानी।
बबुआ बाबू साहेब रहली।
बचपन से
हमहीं उनकर हजामत बनावत रहीं,
उनकर बाप-दादा के भी बनावत रहीं ।
अखिर में,
उ आखिरी हजामत भी हमहीं बनवनी।
हे भागन!
उ हमर हाथे का करववल
बहुत तेज रहले बाबुआ।
गोली लागल रहे बबुआन के
आँख पोंछते हुए चाचा चल दिए,
मैं तो बस निहारता रहा
देश में जलता वह दीयारा,
और वह माँ,
जो हर रोज़ जलाती है , दीयारा
देश के दीयारा के लिए
एक दीयारा ।

सूरज सिंह राजपूत

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