बुधवार, 31 दिसंबर 2025

स्वागत है नव वर्ष का || डॉ. अनिता निधि‌

स्वागत है नव वर्ष का

स्वागत है नव वर्ष का, द्वार खड़ा है आज।
नये संकल्प ले चलें, सुधरे सारे काज।।

नया साल है आ रहा, छाया है मधुमास।
मिटे सभी दुख जो हृदय, मुखरित है उल्लास।।

मधुर व्यवहार सब रखें, जगत सदा सम्मान।
अतिथि हमारे देव हैं, ये अपनी पहचान।।

नवल गीत नव छंद से, बने हमारे राग।
रख कर मन में हौसला,अपनी किस्मत जाग।।

मधुर व्यवहार कीजिए, मिलता सब जग मान।
दिल को मिलती है खुशी, कर्म भाव संज्ञान ।।

© डॉ. अनिता निधि‌

    जमशेदपुर , झारखंड

जाने और आने वाला साल || पूनम सिंह

जाने और आने वाला साल

ऐ जाने वाले साल किसी को गम तो
किसी को खुशी दे गया तू
किसी के घर मातम तो
किसी के घर हंसी दे गया तू

कहीं सुख के आंसू तो
कहीं दुख के आंसू दे गया तू
क्या शिकायत करूं तुझसे
कुछ लेकर, कुछ दे गया तू

गुजरते हुए साल ने
बहुत कुछ सिखाया
भरम को तोड़, अपने पराए
का बोध कराया

आने वाले साल में
जो हम चाहे वह ले आना तू
हम सबकी जिंदगी को
अच्छी तरह सँवारना तू

कुछ सपने रह गए अधूरे
कुछ ख्वाहिशें रह गई अधूरी
यही इच्छा नव वर्ष में
हो जाए वह सब पूरी

हौसले को हिम्मत देकर
साथ मेरा निभाना तू
श्रम को कामयाबी के
शिखर तक पहुंचाना तू
हो नववर्ष मुबारक आप सबको
जश्न माहौल बनाना तू
रोज नूतन विहान बनकर
सबको गले लगाना तू

© पूनम सिंह

    जमशेदपुर , झारखंड

विधा- दोहा छंद || नीलम पेड़ीवाल "विहांगी"

विधा- दोहा छंद

नूतन वत्सर के लिए,हर्षित यह संसार।
अभिनंदन सब कीजिए, लाया हर्ष अपार।।

जीवन में आगे बढ़ें, बुरे समय को भूल।
सबका सम अधिकार हो, खिलें अमन के फूल।।

अगवानी सब कीजिए, प्रतिपल हो वरदान।
नए वर्ष में आपका, बढे़ं मान- सम्मान।।

सपने पूरे हों सभी, नए वर्ष में मीत।
मन के आँगन में छिड़े, नित्य नवल संगीत।।

विनती प्रभु से नित करूँ, रहें सभी नीरोग।
आगे ही बढ़ते रहें,भारत भू के लोग।।

© नीलम पेड़ीवाल "विहांगी"

    जमशेदपुर , झारखंड

दोहे || सर्वानन्द सिंह "पथिक"

दोहे

दो हजार पच्चीस को, कहें अलविदा आप।
स्वागत शुभ छब्बीस का, हर्षित करें मिलाप।।

माह दिसंबर बीतता, बढ़ता शीत प्रभाव।
नए वर्ष का आगमन, हर्षित जले अलाव।।

दिखा रहा शीशा हमें, आज दिसंबर माह।
आने वाले वर्ष में, पूरी कर लो चाह।।

नया साल है आ रहा, करने धूम धमाल।
सुख दुख की यादें लिए, बीत रहा यह साल।।

जो बिछड़े इस वर्ष वे, दुर्लभ थे प्रत्येक।
नया साल देगा हमें, अवसर हर्ष अनेक।।

मंगल हो सबके लिए, विकसित हो यह देश।
सबके घर परिवार में, खुशियों का परिवेश।।

© सर्वानन्द सिंह "पथिक"

    जमशेदपुर , झारखंड

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

घी रोटी ! सूरज सिंह राजपूत

घी रोटी !

मां, मेरे हिस्से की क्या हुई ?
क्या वह सच में बहुत अच्छी होती है ?
स्कूल में,
हर दिन कोई ना कोई लाता है
घी रोटी !

मैं ,
मां मैं कभी क्यों नहीं ले जाता ?
तुम तो हमेशा कहती हो …. कल ले जाना !
कल , कल
ये कल कब आएगा ?
अब तो,
मां अब तो सब मुझे चिड़ते हैं … प्याज रोटी !

मां,
पापा कब लायेंगे ?
धी रोटी !
वो कहां गए ?
कब आयेंगे ?
कब लायेंगे ?
धी रोटी !

मुझे याद है
पापा लाए थे
बहोत पहले
अंडे की सब्जी और घी रोटी,
पापा अपने हाथों से खिलाए थे !
अब इतने दिनों से नहीं आए,
सब लोग बुरे हैं
उनके शरीर घी मल दिया
और न जानें कहां ले गाए ?
पापा को कंधे पर झूला झुलाते

मां,
क्या पापा घी लेकर गए हैं लाने की रोटी ?
सब लोग खाए थे तब हमारे घर
पूरी पकवान और दही भी !
अब कोई नहीं आता हमारे घर,
मां, तब मैं तीसरी कक्षा मे था ।
मां तु, तू न रो,
मुझे नहीं चहिए
धी रोटी!

अब मैं पांचवी कक्षा में हूं !
जब बड़ा हो जाऊंगा ,
मैं लेकर आऊंगा ।
पापा को भी बुलाना,
हम साथ खाएंगे,
धी रोटी!

© सूरज सिंह राजपूत

    जमशेदपुर , झारखंड

ग़ज़ल || लखन विक्रांत

ग़ज़ल

मेरे हिस्से यूँ ज़िंदगी आई!!
ज्यूँ अलालत कोई चली आई!!

वक़्त कटता है अस्पतालों में
साँसें गिनने की अब घड़ी आई!!

चारागर! तेरा हौसला देना
यानी शामत ख़लीते की आई!!

हाये! अहबाब भी गये-आये
हाये! उम्मीद भी गई-आई!!

शुक्रिया दोस्त! उन दुआओं का
जिनसे छनकर ग़ज़ल मेरी आई!!

© लखन विक्रांत

    जमशेदपुर झारखंड

रविवार, 21 दिसंबर 2025

कल रात एक फोन आया || दीपक वर्मा

कल रात एक फोन आया

कल रात एक फोन आया,
मैंने उठाया।
उधर से आवाज आई
कवि जी बधाई !
आपको चुना गया है,
ग्लोबल सम्मान के लिए।
हिंदी साहित्य में
विशेष योगदान के लिए।
अगले महीने की
अठारह तारीख को
आप को दिया जाएगा
एक शाॅल,एक मोमेंटो
और एक शानदार सा उपहार,
और उसके बदले
आपको हमें देने होंगे
सिर्फ दो हजार!
मैंने कहा,भाई!
आप की बात तो सही है।
पर अंदर की बाताऊं,
तो मेरा अभी तक
हिंदी साहित्य में कोई भी,
विशेष योगदान नहीं है।
भाई जो लिखता हूं
उसमें भी दाऊट रहता है,
ज्यादातर में व्याकरण भी
आउट रहता है।
लेखन में झोल है
छंद के मामले में भी
अभी तक डब्बा गोल है।
फिर ये डायरेक्ट ग्लोबल सम्मान
क्या ये कुछ
ज्यादा नहीं है श्रीमान!
वो झल्लाकर बोला,
देखिए कवि जी
ढ़ेर न बतियाएं‌।
और हमें सिर्फ अपनी
सहमति के विषय में बताएं।
वर्ना आप जैसे
बहुत से कवि हैं यहां कतार में,
ऐसे भव्य आयोजन के
इंतजार में हैं।
और हम तो आप से
सिर्फ दो हजार ले रहे हैं।
यहां देने वाले तो
हमें दस हजार तक दे रहे हैं।
इसलिए ज्यादा न सोचें
लाभ और घाटा,
आप जल्द से जल्द
हमारे पास भेजिए
अपनी एक सुंदर सी तस्वीर,
विथ बायो-डाटा।
यकीन मानिए
आपको फायदा मिलेगा ढ़ेर।
आप सिर्फ आम खाइए
मत गिनिएं‌ पेड़।
मैंने कहा,लेकिन
मुझे सम्मानित करने का
भला क्या आधार होगा!
और क्या इस सम्मान से
वाक‌ई मेरे लेखन में
कुछ सुधार होगा!
या फिर साहित्य के नाम पर
शुद्ध व्यापार होगा।
जवाब में उन्होंने
एक बड़ा अच्छा काम किया
कुछ अनमोल से
अनसेंसर्ड शब्द कहे,
और फोन रख दिया।

© दीपक वर्मा

    जमशेदपुर झारखंड

आजकल होता नहीं हर्फ़ भी लिखना मेर || सोनी सुगन्धा

शेर

आजकल होता नहीं हर्फ़ भी लिखना मेरा
मुब्तिला रहती हूँ इन्सां को फ़क़त पढ़ने में

© सोनी सुगन्धाा

    जमशेदपुर झारखंड

महा शशिवदना छंद -गीतिक || बिनोद बेगान

सजल

महा शशिवदना छंद -गीतिका
मौसम दुखकर है,बढ़ी शीत लहरी।
ठंडी से पीड़ा,हुई अभी गहरी।

धुंध कुहासे से,राह नहीं सूझे
धूप रौशनी भी,डरी कहीं ठहरी।

बाहर भीतर तो,हालत दमघोंटू
लगती है अब तो,सरकारें बहरी।

बेहतर गॉंवों की,हालत है थोड़ी
खतरनाक अब तो,जीवन है शहरी।

हुआ मनुज से ही,हाल जानलेवा
छद्म प्रगति की ही,झंडी है फहरी।

© बिनोद बेगाना

    जमशेदपुर झारखंड

सजल || वसंत जमशेदपुरी

सजल

महकी है यह रजनीगंधा या तेरे तन की खुशबू है |
अलकें लहराईं हैं तूने या चंदन-वन की खुशबू है ||

तेरी इस उन्मुक्त हँसी पर तीनों लोक निछावर शुभदे |
तेरे अधरों से निःसृत यह नंदन कानन की खुशबू है ||

कस्तूरी-मृग-सा चंचल मैं इधर-उधर नजरें दौड़ाऊँ |
अब तक समझ नहीं पाया क्यों यह तेरे मन की खुशबू है ||

डरता हूँ तेरी गलियों में एक अजब-सा है सम्मोहन |
अभिसारी आकर्षण इसमें,मृदु परिरंभन की खुशबू है ||

कालिंदी के कूल मिले हम,पूर्णचंद्र को देखा जी भर |
मेरी मुरली तेरी पायल अब तक छन-छन की खुशबू है ||

© वसंत जमशेदपुरी

रविवार, 7 दिसंबर 2025

महासंघर्ष || पद्मा प्रसाद

महासंघर्ष

आज!
ज्ञान की विभिन्न प्रतियोगिताएं,
जीवन का एक यथार्थ हैं,
जीवन एक महासंघर्ष है,
हार तो एक विराम है,
जिंदगी तो चलते रहने का नाम है,
फिर क्यों ??
आत्म-विश्लेषण से घबड़ाना ?
कहना बहुत सरल है,

पर !
संघर्ष पथ पर जो मिले,
उससे कभी न घबड़ाना,
बाधाएं आती हैं राहों में,
ये भी शाश्र्वत सत्य है,

सो !
बिना घबड़ाए हिम्मत दिखाएं,
उस कठिन डगर से निकल जाएं,
खूबसूरत जिंदगी सामने आए,
संघर्षों की राह पे हंसते आए,
इस प्रतियोगिता के दौड़ में,
अकेला निकल जाना बहादुरी है,

वहीं !
अकेला खड़ा रह जाना,
डरपोक होने की निशानी,
कल किसने देखा है?
अभी से लग जाओ,
जिंदगी की स्वर्णिम दौड़ में,
सफलता कदम-कदम पर मिलेगी,
वक्त बहुत कम है,
व्यर्थ न गंवाओ इसे,
इस सत्य को स्वीकार करो,
पढ़ाई एक तपस्या है,
मेहनत और लगन से,
हौसला बुलंद करो,
प्रथम का प्रयास करो,
अब सब्र नहीं संघर्ष करो,
भाग्य भरोसे छोड़ो नहीं,
सफलता के रास्ते चलना है,
स्वर्णिम मंजिल पाने तक,
जीवन एक महासंग्राम है,
तूफानों को चीरकर,

जो !
आगे निकले,
वहीं ! "विजेता"है,
महासंघर्ष का।



पद्मा प्रसाद

मैं चुनूँगी || रीना सिन्हा "सलोनी"

मैं चुनूँगी

फूल तितली नहीं
ज़र्द होते पत्तों को चुनूँगी,
नदी झरने नहीं
खोखली सीपियों को चुनूँगी,
सुर्ख़ रुख़सारों को नहीं

मैं काँपते जीर्ण हाँथों को चुनूँगी,
जीत के जश्न के बदले
हारे हुए लोगों को चुनूँगी,
मैं मिलन का गीत नहीं
विरह की नज़्म को चुनूँगी,
उस प्रेम को चुनूँगी
जो कभी प्रकट ही न किया गया हो,

मैं लंबी चौड़ी सड़कों को नहीं
उन अकेली पगडंडियों को चुनूँगी
जिनपर चलकर कितने सपने शहर जा बसे,
मैं जगमगाती इमारतों को नहीं
अँधेरी झोपड़ियों को चुनूँगी,
मैं चुनूँगी चाय बेचते उस बच्चे को
जिसे स्कूल जाना था,

मैं चुनूँगी पुराने क़स्बों की
उन तंग गलियों को
जहाँ के लोगों के दिल बड़े हैं,

मैं चुनूँगी ऊँचे पहाड़ों के
उस अज्ञात मंदिर को जहाँ कोई न आता हो,
भीड़ और शोर से दूर
किसी सुनसान खंडहर को चुनूँगी,
मैं चुनूँगी किसी विलुप्त होती नदी के
रेतीले सुनसान किनारे को,

मैं चुनूँगी
अस्पताल के आखरी बिस्तर पर पड़े हुए
मौत की राह देखते मरीज़ को,
और मैं चुन लूँगी
जीवन और मृत्यु के बीच का वो क्षण
जहाँ न भय हो, न बेचैनी
और न अंधकार
जहाँ बस रौशनी हो… उम्मीद की रौशनी

रीना सिन्हा सलोनी

दीयारा देश ला || सूरज सिंह राजपूत

दीयारा देश ला

वो रोज जलाती थी एक दीया,
ठीक सुबह 11 बजे।
मिट्टी का एक दीया,
जिसके पीछे,
लाल,
सफेद,
आँटे से लिखती थी
“बबुआ”।
बबुआ,
मेरा जिज्ञासु मन
पास ही मैं खड़े बुजुर्ग चाचा से
पूछ ही बैठा
चाचा,
ई दीया रोज ऐसे ही?
वो भी सुबह 11 बजे?
चाचा ने
लाल रंग के गमछे से
अपनी आँखें पोंछते हुए कहा
“ई दीया, बभुआ खातिर।
हम पूछनी
"बभुआ", ई कइसे?
त चाचाजी कहे
‘उनकर बबुआ
ई देश के दियारा
दीयारा जे जरल देश खातिर !
ठीक एहिए समय,
सबेरे 11 बजे…’
बड़ भिर भइल रहल,
पूरा जवार बाटोरल रहल।
जे दिन बभुआ के देह सरकार लेके आइल रहल।
पत्रकार लोग के तमाम रेला लगल रहल।
अब कहाँ केहू आवेला…
ए बाबू, अब हमरे से कुछ मत पूछऽ।
उ दिन आँखिये से सोझा नाचे लागल।
हम जाति से हजाम बानी।
बबुआ बाबू साहेब रहली।
बचपन से
हमहीं उनकर हजामत बनावत रहीं,
उनकर बाप-दादा के भी बनावत रहीं ।
अखिर में,
उ आखिरी हजामत भी हमहीं बनवनी।
हे भागन!
उ हमर हाथे का करववल
बहुत तेज रहले बाबुआ।
गोली लागल रहे बबुआन के
आँख पोंछते हुए चाचा चल दिए,
मैं तो बस निहारता रहा
देश में जलता वह दीयारा,
और वह माँ,
जो हर रोज़ जलाती है , दीयारा
देश के दीयारा के लिए
एक दीयारा ।

सूरज सिंह राजपूत

दोहा || नीलम पेडी़वाल "विहांगी"

गणपति
जीवन में करना सदा,
दिन-प्रतिदिन सन्तोष।
गणपति बप्पा आप ही‌,
हरिए मेरे दोष।।

शारदे
माँ निशिदिन विनती करूँ,
बहुत कमाऊँ नाम।
मार्ग सुगम होते रहें,
बनते जाए काम।।

गुरु
परम पूज्य गुरुदेव जी,
वन्दन बारम्बार।
नित्य आपकी भक्ति की,
महिमा अपरम्पार।।

सूरज
सूरज उजियारा करे,
गया सवेरे जाग।
गर्म दुपहरी में सदा,
जैसे उगले आग।।

सत्य
सत्य कहो मितवा! सदा,
मन में दृढ़ लो ठान।
दुश्मन होंगे सामने,
हृद में रख अवदान।।

आशा
आशा रखिये राम से,
वे हैं तारणहार।
पूरी करते कामना,
उससे बेड़ा पार।।

उमंग
साहस और उमंग से,
बढ़ता रहे समाज।
पुलकित होना नेह से,
करना उत्तम काज।।

नीलम पेडी़वाल "विहांगी"

यही जीवन है || मनीष सिंह "वंदन"

शीर्षक : यही जीवन है ।

निस्पृह वक्त के समदर्शी चरखे पर
कत रही है अहर्निश उम्र की महीन सूत
बुनकर तैयार हो रहे हैं
स्मृतियों के तमाम
छोटे-बड़े अनमोल चादर
जिनमें लिपटी है तरबतर अनुभव की तीखी धूप
जद्दोजहद से सने कुछ बोसा
पीलिया के शिकार हो चुके कुछ रेखाचित्र
और
बूढ़ी आंखों के अनचाहे खुशियों की आमद के निशान

उम्र की ढ़लान पर
होश के अवसान पर
सपने सादे सच्चे लगने लगेंगे
पके हुए फल अच्छे लगने लगेंगे
कदम-कदम पर रोक-टोक होगा
माथे पर पश्चाताप का बोझ होगा
चेहरे पर झूठी हंसी होगी
मगर जिगर में शोक होगा

देह की चमक गायब होगी
आवाज की धमक गायब होगी
भोजन से नमक गायब होगा
पीड़ा को व्यक्त करने की सनक होगी

मुंह में जब दांत न होगा, पेट में जब आंत न होगी
कहने-सुनने को ढ़ेर सारी बात न होगी
पोते पोतियों की करतल ध्वनि
जर्जर हड्डियों में हवा भरने का अथक प्रयास करेगी
मगर
हम चल न पाएंगे, सिमट कर रह जाएंगे

पांव दिमाग की नहीं सुनेगा
दिमाग दिल की नहीं सुनेगा
डॉक्टर धड़कन की शोर नहीं सुनेगा
और फिर....धड़ाम....कोई कुछ नहीं सुनेगा
खामोश....स्तब्ध....संज्ञाशून्य

मनीष सिंह "वंदन"