मैं चुनूँगी
फूल तितली नहीं
ज़र्द होते पत्तों को चुनूँगी,
नदी झरने नहीं
खोखली सीपियों को चुनूँगी,
सुर्ख़ रुख़सारों को नहीं
मैं काँपते जीर्ण हाँथों को चुनूँगी,
जीत के जश्न के बदले
हारे हुए लोगों को चुनूँगी,
मैं मिलन का गीत नहीं
विरह की नज़्म को चुनूँगी,
उस प्रेम को चुनूँगी
जो कभी प्रकट ही न किया गया हो,
मैं लंबी चौड़ी सड़कों को नहीं
उन अकेली पगडंडियों को चुनूँगी
जिनपर चलकर कितने सपने शहर जा बसे,
मैं जगमगाती इमारतों को नहीं
अँधेरी झोपड़ियों को चुनूँगी,
मैं चुनूँगी चाय बेचते उस बच्चे को
जिसे स्कूल जाना था,
मैं चुनूँगी पुराने क़स्बों की
उन तंग गलियों को
जहाँ के लोगों के दिल बड़े हैं,
मैं चुनूँगी ऊँचे पहाड़ों के
उस अज्ञात मंदिर को जहाँ कोई न आता हो,
भीड़ और शोर से दूर
किसी सुनसान खंडहर को चुनूँगी,
मैं चुनूँगी किसी विलुप्त होती नदी के
रेतीले सुनसान किनारे को,
मैं चुनूँगी
अस्पताल के आखरी बिस्तर पर पड़े हुए
मौत की राह देखते मरीज़ को,
और मैं चुन लूँगी
जीवन और मृत्यु के बीच का वो क्षण
जहाँ न भय हो, न बेचैनी
और न अंधकार
जहाँ बस रौशनी हो… उम्मीद की रौशनी
रीना सिन्हा सलोनी