रविवार, 7 दिसंबर 2025

महासंघर्ष || पद्मा प्रसाद

महासंघर्ष

आज!
ज्ञान की विभिन्न प्रतियोगिताएं,
जीवन का एक यथार्थ हैं,
जीवन एक महासंघर्ष है,
हार तो एक विराम है,
जिंदगी तो चलते रहने का नाम है,
फिर क्यों ??
आत्म-विश्लेषण से घबड़ाना ?
कहना बहुत सरल है,

पर !
संघर्ष पथ पर जो मिले,
उससे कभी न घबड़ाना,
बाधाएं आती हैं राहों में,
ये भी शाश्र्वत सत्य है,

सो !
बिना घबड़ाए हिम्मत दिखाएं,
उस कठिन डगर से निकल जाएं,
खूबसूरत जिंदगी सामने आए,
संघर्षों की राह पे हंसते आए,
इस प्रतियोगिता के दौड़ में,
अकेला निकल जाना बहादुरी है,

वहीं !
अकेला खड़ा रह जाना,
डरपोक होने की निशानी,
कल किसने देखा है?
अभी से लग जाओ,
जिंदगी की स्वर्णिम दौड़ में,
सफलता कदम-कदम पर मिलेगी,
वक्त बहुत कम है,
व्यर्थ न गंवाओ इसे,
इस सत्य को स्वीकार करो,
पढ़ाई एक तपस्या है,
मेहनत और लगन से,
हौसला बुलंद करो,
प्रथम का प्रयास करो,
अब सब्र नहीं संघर्ष करो,
भाग्य भरोसे छोड़ो नहीं,
सफलता के रास्ते चलना है,
स्वर्णिम मंजिल पाने तक,
जीवन एक महासंग्राम है,
तूफानों को चीरकर,

जो !
आगे निकले,
वहीं ! "विजेता"है,
महासंघर्ष का।



पद्मा प्रसाद

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