रविवार, 7 दिसंबर 2025

यही जीवन है || मनीष सिंह "वंदन"

शीर्षक : यही जीवन है ।

निस्पृह वक्त के समदर्शी चरखे पर
कत रही है अहर्निश उम्र की महीन सूत
बुनकर तैयार हो रहे हैं
स्मृतियों के तमाम
छोटे-बड़े अनमोल चादर
जिनमें लिपटी है तरबतर अनुभव की तीखी धूप
जद्दोजहद से सने कुछ बोसा
पीलिया के शिकार हो चुके कुछ रेखाचित्र
और
बूढ़ी आंखों के अनचाहे खुशियों की आमद के निशान

उम्र की ढ़लान पर
होश के अवसान पर
सपने सादे सच्चे लगने लगेंगे
पके हुए फल अच्छे लगने लगेंगे
कदम-कदम पर रोक-टोक होगा
माथे पर पश्चाताप का बोझ होगा
चेहरे पर झूठी हंसी होगी
मगर जिगर में शोक होगा

देह की चमक गायब होगी
आवाज की धमक गायब होगी
भोजन से नमक गायब होगा
पीड़ा को व्यक्त करने की सनक होगी

मुंह में जब दांत न होगा, पेट में जब आंत न होगी
कहने-सुनने को ढ़ेर सारी बात न होगी
पोते पोतियों की करतल ध्वनि
जर्जर हड्डियों में हवा भरने का अथक प्रयास करेगी
मगर
हम चल न पाएंगे, सिमट कर रह जाएंगे

पांव दिमाग की नहीं सुनेगा
दिमाग दिल की नहीं सुनेगा
डॉक्टर धड़कन की शोर नहीं सुनेगा
और फिर....धड़ाम....कोई कुछ नहीं सुनेगा
खामोश....स्तब्ध....संज्ञाशून्य

मनीष सिंह "वंदन"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें