रविवार, 21 दिसंबर 2025

महा शशिवदना छंद -गीतिक || बिनोद बेगान

सजल

महा शशिवदना छंद -गीतिका
मौसम दुखकर है,बढ़ी शीत लहरी।
ठंडी से पीड़ा,हुई अभी गहरी।

धुंध कुहासे से,राह नहीं सूझे
धूप रौशनी भी,डरी कहीं ठहरी।

बाहर भीतर तो,हालत दमघोंटू
लगती है अब तो,सरकारें बहरी।

बेहतर गॉंवों की,हालत है थोड़ी
खतरनाक अब तो,जीवन है शहरी।

हुआ मनुज से ही,हाल जानलेवा
छद्म प्रगति की ही,झंडी है फहरी।

© बिनोद बेगाना

    जमशेदपुर झारखंड

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