कल रात एक फोन आया
कल रात एक फोन आया,
मैंने उठाया।
उधर से आवाज आई
कवि जी बधाई !
आपको चुना गया है,
ग्लोबल सम्मान के लिए।
हिंदी साहित्य में
विशेष योगदान के लिए।
अगले महीने की
अठारह तारीख को
आप को दिया जाएगा
एक शाॅल,एक मोमेंटो
और एक शानदार सा उपहार,
और उसके बदले
आपको हमें देने होंगे
सिर्फ दो हजार!
मैंने कहा,भाई!
आप की बात तो सही है।
पर अंदर की बाताऊं,
तो मेरा अभी तक
हिंदी साहित्य में कोई भी,
विशेष योगदान नहीं है।
भाई जो लिखता हूं
उसमें भी दाऊट रहता है,
ज्यादातर में व्याकरण भी
आउट रहता है।
लेखन में झोल है
छंद के मामले में भी
अभी तक डब्बा गोल है।
फिर ये डायरेक्ट ग्लोबल सम्मान
क्या ये कुछ
ज्यादा नहीं है श्रीमान!
वो झल्लाकर बोला,
देखिए कवि जी
ढ़ेर न बतियाएं।
और हमें सिर्फ अपनी
सहमति के विषय में बताएं।
वर्ना आप जैसे
बहुत से कवि हैं यहां कतार में,
ऐसे भव्य आयोजन के
इंतजार में हैं।
और हम तो आप से
सिर्फ दो हजार ले रहे हैं।
यहां देने वाले तो
हमें दस हजार तक दे रहे हैं।
इसलिए ज्यादा न सोचें
लाभ और घाटा,
आप जल्द से जल्द
हमारे पास भेजिए
अपनी एक सुंदर सी तस्वीर,
विथ बायो-डाटा।
यकीन मानिए
आपको फायदा मिलेगा ढ़ेर।
आप सिर्फ आम खाइए
मत गिनिएं पेड़।
मैंने कहा,लेकिन
मुझे सम्मानित करने का
भला क्या आधार होगा!
और क्या इस सम्मान से
वाकई मेरे लेखन में
कुछ सुधार होगा!
या फिर साहित्य के नाम पर
शुद्ध व्यापार होगा।
जवाब में उन्होंने
एक बड़ा अच्छा काम किया
कुछ अनमोल से
अनसेंसर्ड शब्द कहे,
और फोन रख दिया।
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