रविवार, 21 दिसंबर 2025

महा शशिवदना छंद -गीतिक || बिनोद बेगान

सजल

महा शशिवदना छंद -गीतिका
मौसम दुखकर है,बढ़ी शीत लहरी।
ठंडी से पीड़ा,हुई अभी गहरी।

धुंध कुहासे से,राह नहीं सूझे
धूप रौशनी भी,डरी कहीं ठहरी।

बाहर भीतर तो,हालत दमघोंटू
लगती है अब तो,सरकारें बहरी।

बेहतर गॉंवों की,हालत है थोड़ी
खतरनाक अब तो,जीवन है शहरी।

हुआ मनुज से ही,हाल जानलेवा
छद्म प्रगति की ही,झंडी है फहरी।

© बिनोद बेगाना

    जमशेदपुर झारखंड

सजल || वसंत जमशेदपुरी

सजल

महकी है यह रजनीगंधा या तेरे तन की खुशबू है |
अलकें लहराईं हैं तूने या चंदन-वन की खुशबू है ||

तेरी इस उन्मुक्त हँसी पर तीनों लोक निछावर शुभदे |
तेरे अधरों से निःसृत यह नंदन कानन की खुशबू है ||

कस्तूरी-मृग-सा चंचल मैं इधर-उधर नजरें दौड़ाऊँ |
अब तक समझ नहीं पाया क्यों यह तेरे मन की खुशबू है ||

डरता हूँ तेरी गलियों में एक अजब-सा है सम्मोहन |
अभिसारी आकर्षण इसमें,मृदु परिरंभन की खुशबू है ||

कालिंदी के कूल मिले हम,पूर्णचंद्र को देखा जी भर |
मेरी मुरली तेरी पायल अब तक छन-छन की खुशबू है ||

© वसंत जमशेदपुरी

रविवार, 7 दिसंबर 2025

महासंघर्ष || पद्मा प्रसाद

महासंघर्ष

आज!
ज्ञान की विभिन्न प्रतियोगिताएं,
जीवन का एक यथार्थ हैं,
जीवन एक महासंघर्ष है,
हार तो एक विराम है,
जिंदगी तो चलते रहने का नाम है,
फिर क्यों ??
आत्म-विश्लेषण से घबड़ाना ?
कहना बहुत सरल है,

पर !
संघर्ष पथ पर जो मिले,
उससे कभी न घबड़ाना,
बाधाएं आती हैं राहों में,
ये भी शाश्र्वत सत्य है,

सो !
बिना घबड़ाए हिम्मत दिखाएं,
उस कठिन डगर से निकल जाएं,
खूबसूरत जिंदगी सामने आए,
संघर्षों की राह पे हंसते आए,
इस प्रतियोगिता के दौड़ में,
अकेला निकल जाना बहादुरी है,

वहीं !
अकेला खड़ा रह जाना,
डरपोक होने की निशानी,
कल किसने देखा है?
अभी से लग जाओ,
जिंदगी की स्वर्णिम दौड़ में,
सफलता कदम-कदम पर मिलेगी,
वक्त बहुत कम है,
व्यर्थ न गंवाओ इसे,
इस सत्य को स्वीकार करो,
पढ़ाई एक तपस्या है,
मेहनत और लगन से,
हौसला बुलंद करो,
प्रथम का प्रयास करो,
अब सब्र नहीं संघर्ष करो,
भाग्य भरोसे छोड़ो नहीं,
सफलता के रास्ते चलना है,
स्वर्णिम मंजिल पाने तक,
जीवन एक महासंग्राम है,
तूफानों को चीरकर,

जो !
आगे निकले,
वहीं ! "विजेता"है,
महासंघर्ष का।



पद्मा प्रसाद

मैं चुनूँगी || रीना सिन्हा "सलोनी"

मैं चुनूँगी

फूल तितली नहीं
ज़र्द होते पत्तों को चुनूँगी,
नदी झरने नहीं
खोखली सीपियों को चुनूँगी,
सुर्ख़ रुख़सारों को नहीं

मैं काँपते जीर्ण हाँथों को चुनूँगी,
जीत के जश्न के बदले
हारे हुए लोगों को चुनूँगी,
मैं मिलन का गीत नहीं
विरह की नज़्म को चुनूँगी,
उस प्रेम को चुनूँगी
जो कभी प्रकट ही न किया गया हो,

मैं लंबी चौड़ी सड़कों को नहीं
उन अकेली पगडंडियों को चुनूँगी
जिनपर चलकर कितने सपने शहर जा बसे,
मैं जगमगाती इमारतों को नहीं
अँधेरी झोपड़ियों को चुनूँगी,
मैं चुनूँगी चाय बेचते उस बच्चे को
जिसे स्कूल जाना था,

मैं चुनूँगी पुराने क़स्बों की
उन तंग गलियों को
जहाँ के लोगों के दिल बड़े हैं,

मैं चुनूँगी ऊँचे पहाड़ों के
उस अज्ञात मंदिर को जहाँ कोई न आता हो,
भीड़ और शोर से दूर
किसी सुनसान खंडहर को चुनूँगी,
मैं चुनूँगी किसी विलुप्त होती नदी के
रेतीले सुनसान किनारे को,

मैं चुनूँगी
अस्पताल के आखरी बिस्तर पर पड़े हुए
मौत की राह देखते मरीज़ को,
और मैं चुन लूँगी
जीवन और मृत्यु के बीच का वो क्षण
जहाँ न भय हो, न बेचैनी
और न अंधकार
जहाँ बस रौशनी हो… उम्मीद की रौशनी

रीना सिन्हा सलोनी

दीयारा देश ला || सूरज सिंह राजपूत

दीयारा देश ला

वो रोज जलाती थी एक दीया,
ठीक सुबह 11 बजे।
मिट्टी का एक दीया,
जिसके पीछे,
लाल,
सफेद,
आँटे से लिखती थी
“बबुआ”।
बबुआ,
मेरा जिज्ञासु मन
पास ही मैं खड़े बुजुर्ग चाचा से
पूछ ही बैठा
चाचा,
ई दीया रोज ऐसे ही?
वो भी सुबह 11 बजे?
चाचा ने
लाल रंग के गमछे से
अपनी आँखें पोंछते हुए कहा
“ई दीया, बभुआ खातिर।
हम पूछनी
"बभुआ", ई कइसे?
त चाचाजी कहे
‘उनकर बबुआ
ई देश के दियारा
दीयारा जे जरल देश खातिर !
ठीक एहिए समय,
सबेरे 11 बजे…’
बड़ भिर भइल रहल,
पूरा जवार बाटोरल रहल।
जे दिन बभुआ के देह सरकार लेके आइल रहल।
पत्रकार लोग के तमाम रेला लगल रहल।
अब कहाँ केहू आवेला…
ए बाबू, अब हमरे से कुछ मत पूछऽ।
उ दिन आँखिये से सोझा नाचे लागल।
हम जाति से हजाम बानी।
बबुआ बाबू साहेब रहली।
बचपन से
हमहीं उनकर हजामत बनावत रहीं,
उनकर बाप-दादा के भी बनावत रहीं ।
अखिर में,
उ आखिरी हजामत भी हमहीं बनवनी।
हे भागन!
उ हमर हाथे का करववल
बहुत तेज रहले बाबुआ।
गोली लागल रहे बबुआन के
आँख पोंछते हुए चाचा चल दिए,
मैं तो बस निहारता रहा
देश में जलता वह दीयारा,
और वह माँ,
जो हर रोज़ जलाती है , दीयारा
देश के दीयारा के लिए
एक दीयारा ।

सूरज सिंह राजपूत

दोहा || नीलम पेडी़वाल "विहांगी"

गणपति
जीवन में करना सदा,
दिन-प्रतिदिन सन्तोष।
गणपति बप्पा आप ही‌,
हरिए मेरे दोष।।

शारदे
माँ निशिदिन विनती करूँ,
बहुत कमाऊँ नाम।
मार्ग सुगम होते रहें,
बनते जाए काम।।

गुरु
परम पूज्य गुरुदेव जी,
वन्दन बारम्बार।
नित्य आपकी भक्ति की,
महिमा अपरम्पार।।

सूरज
सूरज उजियारा करे,
गया सवेरे जाग।
गर्म दुपहरी में सदा,
जैसे उगले आग।।

सत्य
सत्य कहो मितवा! सदा,
मन में दृढ़ लो ठान।
दुश्मन होंगे सामने,
हृद में रख अवदान।।

आशा
आशा रखिये राम से,
वे हैं तारणहार।
पूरी करते कामना,
उससे बेड़ा पार।।

उमंग
साहस और उमंग से,
बढ़ता रहे समाज।
पुलकित होना नेह से,
करना उत्तम काज।।

नीलम पेडी़वाल "विहांगी"

यही जीवन है || मनीष सिंह "वंदन"

शीर्षक : यही जीवन है ।

निस्पृह वक्त के समदर्शी चरखे पर
कत रही है अहर्निश उम्र की महीन सूत
बुनकर तैयार हो रहे हैं
स्मृतियों के तमाम
छोटे-बड़े अनमोल चादर
जिनमें लिपटी है तरबतर अनुभव की तीखी धूप
जद्दोजहद से सने कुछ बोसा
पीलिया के शिकार हो चुके कुछ रेखाचित्र
और
बूढ़ी आंखों के अनचाहे खुशियों की आमद के निशान

उम्र की ढ़लान पर
होश के अवसान पर
सपने सादे सच्चे लगने लगेंगे
पके हुए फल अच्छे लगने लगेंगे
कदम-कदम पर रोक-टोक होगा
माथे पर पश्चाताप का बोझ होगा
चेहरे पर झूठी हंसी होगी
मगर जिगर में शोक होगा

देह की चमक गायब होगी
आवाज की धमक गायब होगी
भोजन से नमक गायब होगा
पीड़ा को व्यक्त करने की सनक होगी

मुंह में जब दांत न होगा, पेट में जब आंत न होगी
कहने-सुनने को ढ़ेर सारी बात न होगी
पोते पोतियों की करतल ध्वनि
जर्जर हड्डियों में हवा भरने का अथक प्रयास करेगी
मगर
हम चल न पाएंगे, सिमट कर रह जाएंगे

पांव दिमाग की नहीं सुनेगा
दिमाग दिल की नहीं सुनेगा
डॉक्टर धड़कन की शोर नहीं सुनेगा
और फिर....धड़ाम....कोई कुछ नहीं सुनेगा
खामोश....स्तब्ध....संज्ञाशून्य

मनीष सिंह "वंदन"